Tuesday, 29 July 2025

ग़ज़ल: खामोशी सजाना बाकी है


 ग़ज़ल: खामोशी सजाना बाकी है

मत्ला:
कोई ख़्वाहिश न कोई फ़रमाइश बाकी है।
ज़िंदगी में अब और क्या होना बाकी है।।

मर तो हम तब गए थे,जब य़कीं तूटा।
जिस्म से बस अब जान जाना बाकी है।।

तुझसे शिकवा न कोई मलाल रहा बाकी।
बस ये टूटा दिल है,इसे समझाना बाकी है।।

धिरे धिरे हर अंग हुआ रुसवा मुझसे।
बस इक सांस रुकी है,उसे जाना बाकी है।।

मक़्ता:
'मेघ’अब और कुछ आरज़ू नहीं मिरी कब्र की।
सिर्फ़ इक ख़ामोशी जुरुरी है, उसे सजाना बाकी है।।

मंगलवार, २९/७/२५ , १०:२१ PM
अजय सरदेसाई -मेघ

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