लफ़्ज़ मेरे ही थे, पर मायने बदलते गए,
तुम जो ख़ामोश रहीं, झगड़े खुद-ब-खुद मिटते गए।
कहना बहुत था, मगर लफ़्ज होंठों पे ही अटके रहे,
आँखों में देखा तुम्हें, मेरे लफ़्ज़ मिटते गए।
आँखों में ढूँढता रहा अपनी पुरानी पहचान,
तुम्हारी एक नज़र में सब सवाल पिघलते गए।
वक़्त की धारा में हर चीज़ बहती चली गई,
मेरे ही क़दमों के निशाँ, रास्ते बदलते गए।
चुप्पी से भी न कम हुआ रिश्ते का बोझ,
तेज़-तेज़ लफ़्ज़ सभी धीरे-धीरे जलाते गए।
मेघ कहे—साये सा रिश्ता था हमारा कभी,
रौशनी में हम दोनों अलग होते गए।
अजय सरदेसाई (मेघ)
शुक्रवार, 16/01/26, 05:45 PM
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