श्रोता की तलाश
कोई तो श्रोता मिल जाए मुझे,
मेरी कविताएँ सुनने वाला।
मिल जाए मुझे जो किसी दिन,
सुनाऊँ उसे मैं कविताएँ आला।
कविताओं में होंगी बहुत-सी
यहाँ-वहाँ की बातें,
इधर-उधर की दूर दिशाओं की
होंगी अनगिनत सौगातें।
कविता में होगी नर्म सुबह भी,
और सृजनात्मक सूरज होगा,
सैर करेंगे साथ उनके हम,
जब तक न अँधेरा होगा।
नवरंगों से नवरसों से भरी
होंगी मेरी रचनाएँ,
कैसी लगीं उसे मेरी कविताएँ,
यह श्रोता मुझको बतलाए।
चाँदनी रात आएगी तब तक,
फिर मैं ग़ज़ल सुनाऊँगा,
चिराग़ जलेंगे धीरे-धीरे,
एक नज़्म में गुनगुनाऊँगा।
चाह यही है कि यह महफ़िल
रात भर चलती रहे,
रात का अंत न कभी भी हो,
और मेरी कविता चलती रहे।
…
कविता मेरी चलती रहे।
बस — मेरी ही कविता चलती रहे।
बुधवार, १४/१/२६ , ०८:३२ PM
अजय सरदेसाई -मेघ
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