Tuesday, 13 January 2026

अब मैं शब्दों को दौड़ाता नहीं


अब मैं शब्दों को दौड़ाता नहीं,

उन्हें यूंही बैठने देता हूँ मेरे पास।

 

जो कहना था, वह सब कह चुका है मन,

अब न कहना भी एक संवाद सा लगता है।

 

थक गए हैं जज़्बात भी चीख़ते-चीख़ते,

आज ख़ामोशी को ओढ़ लेना सुहाना लगता है।

 

न उजाले की ज़िद, न अँधेरे से बैर,

जो मिला है वही अब काफ़ी लगता है।

 

मैं ठहर गया हूँ वक़्त के कंधे पर,

अब न आगे की जल्दी, न पीछे का अफ़सोस लगता है।

 

सोमवार, १२/१/२६ , ०८:०० PM

अजय सरदेसाई -मेघ


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