Thursday, 18 September 2025

आईने में जो अक्स देखोगे तो घबराओगे



आईने में जो अक्स देखोगे तो घबरा जाओगे।
घर, शहर, ये दुनिया — सब छोड़ जाओगे।।


सन्नाटे में जब नाम अपना पुकारोगे।
जवाब न आया तो भीतर सहम जाओगे।।


मिट्टी की महक से जब सचाई उभरेगी।
टूटे रिश्तों के बिखरे सियों में उलझ जाओगे।।


नींदों में जो ख़्वाब टूटा सा पाओगे।
सुबह को उजाला देखकर तड़प जाओगे।।


दिल में जो बचा-खुचा सपना जगाओगे।
ख़ुद को ही अजनबी बनता पाओगे।।


"मेघ" आख़िर में जब चुपचाप बैठ जाओगे।
बस अपनी साँसों का बोझ महसूस कर जाओगे।।


गुरुवार, १८/९/२५ , ११:०२ AM
अजय सरदेसाई -मेघ

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