Sunday, 17 August 2025

कुछ ख़्वाब जमा रखे थे



कुछ ख़्वाब जमा रखे थे, सो उड़ा रहा हूँ,

यही दौलत थी मेरी, सो लुटा रहा हूँ।।

 

तेरी यादों के मंज़र दिल निचोड़ रहे हैं,

एक-एक करके उन्हें मिटा रहा हूँ।।

 

ज़िंदगी यूँ ही गुज़र जाती तो अच्छा था,

मगर तेरी बेदिली का बोझ उठा रहा हूँ।।

 

इश्क़ तुझसे करना रास आया न मुझे,

अब उसी ख़ता की सज़ा पा रहा हूँ।।

 

इश्क़ वालों को दर्द नसीब है — यही निज़ाम है,

मेघ, विरासत जो मिली, उसे निभा रहा हूँ।।

 

रविवार, १७/८/२५ , ६:१५ PM

अजय सरदेसाई -मेघ


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